भगवान शिव का प्रिय वाद्य डमरू क्यों है?
हिंदू परंपरा के प्राय: सभी प्रमुख देवताओं के स्वरूप में उनके वस्त्र, आभूषण, शस्त्र और वाहनों के अलावा वाद्य का भी समावेश किया गया है। विष्णु के साथ शंख, सरस्वती के साथ वीणा, कृष्ण के साथ बांसुरी आदि इसी के उदाहरण हैं। भगवान शिव अनादि देवता हैं, अर्थात न उनका जन्म हुआ, न ही उनके अस्तित्व की कोई शुरूआत है। वे थे, हैं और बस रहेंगे। यही अनादि भाव का अर्थ है। इस अर्थ में भगवान शिव योग, कला, संगीत, ज्ञान आदि की समस्त धाराओं के प्रणेता और प्रेरक हैं। मान्यता है कि संसार में जहां जो कुछ भी है उन सबका मूल उत्स भगवान शिव ही हैं। इस अर्थ में डमरू उनका प्रिय वाद्य है, क्योंकि यह मूल नाद (स्वर) का प्रतीक है। जिस तरह ओंकार भी नाद है और भगवान शिव से संबद्ध है उसी तरह डमरू वाद्य के रूप में शिव से जुड़ा हुआ है। इसे आनद्ध वर्ग का वाद्य कहा गया है, जिसे कापालिक भी धारण करते हैं। कहा जाता है कि सुप्रसिद्ध पाणिनीय व्याकरण के प्रारंभिक १४ सूत्र भगवान शंकर के १४ बार किए गए डमरू वादन से ही निकले थे। भगवान की कृपा से महर्षि पाणिनी को यह ध्वनि व्यक्त अक्षरों के रूप में सुनाई दी। आशय यह कि स्वर का जन्म भगवान शिव के द्वारा ही हुआ है। वे उन्हीं के डमरू से नाद रूप में व्यक्त हुए हैं। इस अर्थ में डमरू अनादि शक्ति के नाद का प्रतीक है।
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