तिलक माथे के बीच ही क्यों किया जाता है?
तिलक मस्तक का विशेषकर ललाट का शृंगार है, आभूषण है। किसी भी व्यक्ति की दृष्टि सर्वप्रथम चेहरे पर ही पड़ती है जिसका सबसे ऊपरी भाग मस्तक या ललाट होता है। स्वभावत: प्रथम दृष्टया आकर्षण का केंद्र ललाट ही बनता है। यही कारण है पारंपरिक रूप से शृंगार प्रिय भारतीयों ने ललाट के शृंगार पर जोर दिया। इसके लिए तिलक के कई प्रकार अपनाए। स्त्रियों के लिए बिंदी रूप में और पुरुषों के लिए विविध प्रकार के तिलक रूप में। तिलक लोकाचार में शृंगार है और अध्यात्म में शांति के प्रयास का एक प्रयोग। मनुष्य के मस्तक के ठीक मध्य स्थान अर्थात् आंख की दोनों भोहों के बीच तिलक लगाने का विधान है। ठीक मध्य में आज्ञा चक्र व ब्रह्म रंध्र होता है। यह स्थान भगवान शिव की तीसरी आंख के समान है। यह ज्ञान एवं एकाग्रता से परिपूर्ण माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह पूरे शरीर का विशेष/केंद्र स्थान है। आज्ञा चक्र के माध्यम से ही हमें किसी भी कार्य करने की प्रेरणा मिलती है और इसी से ही सारे कार्य को करने में सक्षम होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार मस्तिष्क के बीचोंबीच ब्रह्म स्वरूप की संज्ञा दी गई है। इसलिए ही मस्तिष्क के मध्य तिलक लगाने की परंपरा है।
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