चिंतन
दोगला अस्तित्व : बहू बनाम बेटी
खाने की मेज पर रखे चाय के प्याले से उठती हुई भांप और मन में उमड़ता विचारों का गुबार, सब जैसे एकाकार हो रहा था। अभी १० मिनट पहले तक सब ठीक था, पर बड़ी बहन के फोन ने हृदय को सोचने पर विवश कर दिया। फोन पर बहन का बार-बार कहना कि ‘मैंने तो बहू को बेटी ही माना तो फिर उसने मुझे बातें क्यों सुनार्इं?' सुनने में तो ये हर घर में होने वाली बात है पर मेरा मन इस तर्क -वितर्क में फसा है कि हमारी बहू बेटी की तरह क्यों? बहू को बहू के रूप में प्रेम नहीं दिया जा सकता। क्या हम बार-बार बहू को बेटी मानने की बात कह कर अपने किसी अपराध बोध को छिपा तो नहीं रहे हैं? या फिर यही बदलते युग की नई परिभाषा है?
मेरी आंखों के सामने दीदी और उसकी नवविवाहिता बहू सुरभि की सौम्य छवि बार-बार आ रही थी। जो दीदी बहू सुरभि के गुणगान करते नहीं थकती थी, आज अचानक उसकी वजह से काफी परेशान लग रही थी। सुरभि एक पढ़ी-लिखी लड़की थी जो अपनी कुंवारी ननद की भांति ही जॉब करना चाहती थी, जैसे वह विवाह के पूर्व किया करती थी। चूंकि सुरभि ने शादी के लिए जॉब से २ महीने की छुट्टी ली थी, २ महीने की छुट्टी समाप्त होने पर जॉब को फिर से जारी रखने के लिए उसने सास-ससुरजी यानी मेरे दीदी-जीजाजी से अपने कार्यक्षेत्र पर जाने की स्वीकृति मांगी। पर दीदी-जीजाजी ने बिना तर्क - वितर्क के सुरभि को नौकरी छोड़ देने का हुकूम दे दिया कि जॉब करने की आवश्यकता नहीं है।सभी सुख-सुविधाएं और उसकी जरूरत पूरी करने के लिए उसका पति सौरभ सक्षम है। उसको जीवनभर किसी भी तरह की कोई कमी नहीं होगी। सुरभि ने बहुत कोशिश की सास-ससुरजी को मनाने की पर वो अपने फैसले से टस से मस ना हुए। अंततः ना चाहते हुए भी सुरभि के मुँह से यह निकल ही गया कि आप अपनी पुत्री और मुझमें फर्क रखते हैं। सिर्फ कहने भर को आपने मुझे बेटी का दर्जा दिया है। आज स्पष्ट हो गया कि मैं सिर्फ बहू हूं। अपनी पुत्री के लिए जॉब करवाने वाला घर-वर भी देख रहे हैं। उसके पढ़-लिखकर जॉब करने में और मेरे पढ़-लिखकर जॉब करने में इतना अंतर क्यों?
२ माह पूर्व ही तो सौरभ और सुरभि का धूमधाम से विवाह कर बहू सुरभि को बेटी बनाकर अपने घर लाये थे और घर के सौम्य वातावरण में सुरभि कुछ ही समय में सबके साथ यूं घुल-मिल गई जैसे वह इस घर की बहू नहीं बेटी ही हो।
पर सुरभि के इस तर्वâ ने दीदी-जीजाजी को अंदर तक हिला कर रख दिया था। फोन पर दीदी से सारी बातें सुनकर मैं भी गहन प्रश्नों में उलझ गई।
क्यों हम बहू को बहू का ही मान-सम्मान नहीं देते हैं? उसको बेटी की उपमा देकर दोगले रिश्ते में क्यों बांधना चाहते हैं? क्या हम बहुओं को बेटियों की तरह ही आजादी दे पाते हैं? क्या बेटियों की तरह उनकी हर इच्छा पूर्ण कर पाते हैं? क्या हम कामकाजी बहुओं को बेटियों की तरह ही घर की जिम्मेदारियों से मुक्त कर पाते हैंं? क्या हमें विवाह के पश्चात बहू का पढ़ाई जारी रखना किंचित भी अखरता नहीं है? क्या हम बहुओं से स्वयं के लिये बेटी से हटकर एक खास सम्मान की आशा नहीं रखते हैं? क्या बहुओं को हमने बेटियों की तरह उनकी मनचाही पोशाक पहनकर समाज में रहने की अनुमति प्रदान की है? यहाँ तक कि बहुओं को हमने अभी तक मुक्तहस्त खर्च करने की और अपनी इच्छानुसार सोने और जागने की भी स्वतंत्रता नहीं दी है आदि अनगिनत प्रश्न बार-बार मेरे दिलोदिमाग में घूमने लगे। मेरा लेखक हृदय इसी निष्कर्ष पर जाकर संतुष्टि की अनुभूति करने लगा कि हमें बहू को बेटी नाम नहीं बल्कि बहू का ही सम्मान देना चाहिए। विवाह के पश्चात बेटी को बहूरूपी नया अस्तित्व मिलना चाहिए। बहू की जिम्मेदारियों के साथ उसका अपना वजूद होना चाहिए। ससुराल में बहू और बेटी के दो रूपों को समय और परिस्थितिनुसार बदलते रहने पर बहू अपने स्वयं के साथ भी न्याय नहीं कर पाती। इस दोहरी जिंदगी के कारण वह पूर्णतः बहू का किरदार भी नहीं निभा पाती है। इस दोहरे रिश्ते के कारण कई बार उसके और उसके ससुरालवालों के समक्ष ऐसी विषम परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं कि रिश्तों की नैया भी डगमगाने लगती है। जग में वाहवाही लूटने के लिए जगदिखावे के लिए बहू को बेटी का नाम देना उचित नहीं है। मेरा विचार है कि हम बहू और बेटी के रिश्ते को अलग-अलग रखें और बहू के अस्तित्व को स्वीकार करें।
‘‘बहूरानी को बेटी बनाना नहीं है कार्य आसान।
पर बहू को बहू का ही क्यों नहीं देते हैं सम्मान?
मैं आज माहेश्वरी टाइम्स पत्रिका के माध्यम से सम्पूर्ण समाज से यह प्रश्न करना चाहूंगी कि क्यों हम बहू को बहू का ही उचित सम्मान और अस्तित्व देकर स्वीकार नहीं कर पाते हैं? हम बहू को बेटी का नाम देकर दोहरी जिंदगी क्यों देते हैं? कृपया एक बार अपनी अंतरात्मा से इस प्रश्न का यथोचित उत्तर जरूर पूछें।
बहूरानी का अपना अस्तित्व ही रहने दो,
इस दोगले जग को चाहे जो कहने दो।
न्याय कर पायेगी तभी तो बहू रिश्तों में,
बहू को अपने मान-सम्मान संग जीने दो।।
मेरी आंखों के सामने दीदी और उसकी नवविवाहिता बहू सुरभि की सौम्य छवि बार-बार आ रही थी। जो दीदी बहू सुरभि के गुणगान करते नहीं थकती थी, आज अचानक उसकी वजह से काफी परेशान लग रही थी। सुरभि एक पढ़ी-लिखी लड़की थी जो अपनी कुंवारी ननद की भांति ही जॉब करना चाहती थी, जैसे वह विवाह के पूर्व किया करती थी। चूंकि सुरभि ने शादी के लिए जॉब से २ महीने की छुट्टी ली थी, २ महीने की छुट्टी समाप्त होने पर जॉब को फिर से जारी रखने के लिए उसने सास-ससुरजी यानी मेरे दीदी-जीजाजी से अपने कार्यक्षेत्र पर जाने की स्वीकृति मांगी। पर दीदी-जीजाजी ने बिना तर्क - वितर्क के सुरभि को नौकरी छोड़ देने का हुकूम दे दिया कि जॉब करने की आवश्यकता नहीं है।सभी सुख-सुविधाएं और उसकी जरूरत पूरी करने के लिए उसका पति सौरभ सक्षम है। उसको जीवनभर किसी भी तरह की कोई कमी नहीं होगी। सुरभि ने बहुत कोशिश की सास-ससुरजी को मनाने की पर वो अपने फैसले से टस से मस ना हुए। अंततः ना चाहते हुए भी सुरभि के मुँह से यह निकल ही गया कि आप अपनी पुत्री और मुझमें फर्क रखते हैं। सिर्फ कहने भर को आपने मुझे बेटी का दर्जा दिया है। आज स्पष्ट हो गया कि मैं सिर्फ बहू हूं। अपनी पुत्री के लिए जॉब करवाने वाला घर-वर भी देख रहे हैं। उसके पढ़-लिखकर जॉब करने में और मेरे पढ़-लिखकर जॉब करने में इतना अंतर क्यों?
२ माह पूर्व ही तो सौरभ और सुरभि का धूमधाम से विवाह कर बहू सुरभि को बेटी बनाकर अपने घर लाये थे और घर के सौम्य वातावरण में सुरभि कुछ ही समय में सबके साथ यूं घुल-मिल गई जैसे वह इस घर की बहू नहीं बेटी ही हो।
पर सुरभि के इस तर्वâ ने दीदी-जीजाजी को अंदर तक हिला कर रख दिया था। फोन पर दीदी से सारी बातें सुनकर मैं भी गहन प्रश्नों में उलझ गई।
क्यों हम बहू को बहू का ही मान-सम्मान नहीं देते हैं? उसको बेटी की उपमा देकर दोगले रिश्ते में क्यों बांधना चाहते हैं? क्या हम बहुओं को बेटियों की तरह ही आजादी दे पाते हैं? क्या बेटियों की तरह उनकी हर इच्छा पूर्ण कर पाते हैं? क्या हम कामकाजी बहुओं को बेटियों की तरह ही घर की जिम्मेदारियों से मुक्त कर पाते हैंं? क्या हमें विवाह के पश्चात बहू का पढ़ाई जारी रखना किंचित भी अखरता नहीं है? क्या हम बहुओं से स्वयं के लिये बेटी से हटकर एक खास सम्मान की आशा नहीं रखते हैं? क्या बहुओं को हमने बेटियों की तरह उनकी मनचाही पोशाक पहनकर समाज में रहने की अनुमति प्रदान की है? यहाँ तक कि बहुओं को हमने अभी तक मुक्तहस्त खर्च करने की और अपनी इच्छानुसार सोने और जागने की भी स्वतंत्रता नहीं दी है आदि अनगिनत प्रश्न बार-बार मेरे दिलोदिमाग में घूमने लगे। मेरा लेखक हृदय इसी निष्कर्ष पर जाकर संतुष्टि की अनुभूति करने लगा कि हमें बहू को बेटी नाम नहीं बल्कि बहू का ही सम्मान देना चाहिए। विवाह के पश्चात बेटी को बहूरूपी नया अस्तित्व मिलना चाहिए। बहू की जिम्मेदारियों के साथ उसका अपना वजूद होना चाहिए। ससुराल में बहू और बेटी के दो रूपों को समय और परिस्थितिनुसार बदलते रहने पर बहू अपने स्वयं के साथ भी न्याय नहीं कर पाती। इस दोहरी जिंदगी के कारण वह पूर्णतः बहू का किरदार भी नहीं निभा पाती है। इस दोहरे रिश्ते के कारण कई बार उसके और उसके ससुरालवालों के समक्ष ऐसी विषम परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं कि रिश्तों की नैया भी डगमगाने लगती है। जग में वाहवाही लूटने के लिए जगदिखावे के लिए बहू को बेटी का नाम देना उचित नहीं है। मेरा विचार है कि हम बहू और बेटी के रिश्ते को अलग-अलग रखें और बहू के अस्तित्व को स्वीकार करें।
‘‘बहूरानी को बेटी बनाना नहीं है कार्य आसान।
पर बहू को बहू का ही क्यों नहीं देते हैं सम्मान?
मैं आज माहेश्वरी टाइम्स पत्रिका के माध्यम से सम्पूर्ण समाज से यह प्रश्न करना चाहूंगी कि क्यों हम बहू को बहू का ही उचित सम्मान और अस्तित्व देकर स्वीकार नहीं कर पाते हैं? हम बहू को बेटी का नाम देकर दोहरी जिंदगी क्यों देते हैं? कृपया एक बार अपनी अंतरात्मा से इस प्रश्न का यथोचित उत्तर जरूर पूछें।
बहूरानी का अपना अस्तित्व ही रहने दो,
इस दोगले जग को चाहे जो कहने दो।
न्याय कर पायेगी तभी तो बहू रिश्तों में,
बहू को अपने मान-सम्मान संग जीने दो।।
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