श्रीयंत्र दो शब्दों का जोड़ है- श्री और यंत्र। स्पष्ट रूप से श्री शब्द लक्ष्मी के लिए उपयोग किया गया है। यह वेद में भी आया है अैार लक्ष्मी को ही संबोधित किया गया है। आगे चलकर देवताओं के एक विरुद के रूप में तथा देवताओं के साथ मानवों के लिए सम्मान सूचक विशेषण के रूप में भी श्री का उपयोग किया गया। यंत्र निर्माण प्राचीन है। ये धातु पत्र, भोज पत्र या मृत्तिका वेदी पर बनाए जाते रहे हैं। नृसिंहपूर्वतापनियोपनिषद् के दूसरे खंड में यंत्र बनाने के निर्देश हैं। कहा गया है इन्हें कंठ, भुजा या शिखा में पहनने से शक्ति मिलती है। इस तरह यंत्र अभिमंत्रित कर तैयार किए जाते हैं, जिसका उद्देश्य शांति, सफलता या मनोकामना को पूरा करना होता है। श्रीयंत्र लक्ष्मी का आह्वान कर तैयार किया जाता है। जिसका लक्ष्य यश, कीर्ति और संपदा के साथ सफलता प्राप्त करना बताया गया है। यह लोकप्रिय है और प्राय: वणिक श्रद्धालुओं के यहां पूजा में रखा जाता है।
वैदिक परंपरा में प्रचलित अनेक प्रकार के यज्ञों में अश्वमेध यज्ञ महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद में इससे संबंधित दो मंत्र मिलते हैं, जबकि वेदोत्तर साहित्य में इसकी विस्तृत चर्चा है। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड और महाभारत में भी अश्वमेध यज्ञ का वर्णन है। रावण विजय के उपरांत राम द्वारा छोड़े गए अश्व को लेकर लव-कुश व रामसेना का युद्ध प्रसिद्ध है। महाभारत में युधिष्ठिर ने भी कौरवों पर विजय के बाद पापमोचन के लिए अश्वमेध यज्ञ किया था। वस्तुत: यह एक राजनीतिक यज्ञ था। जिसे वही सम्राट कर सकता था जिसका आधिपत्य अन्य नरेश स्वीकारते हों। इसमें एक अश्व छोड़ा जाता था, वह जहां तक जाता, वह भूमि यज्ञकर्ता की मानी जाती थी। विरोध करने वाले को अश्व के पीछे आ रही यज्ञकर्ता की सेना से युद्ध करना होता था। ऐतरेय ब्राह्मण में पूरी पृथ्वी पर विजय के बाद यह यज्ञ करने वाले महाराजाओं की सूची भी मिलती है। यह यज्ञ वसंत या ग्रीष्म ऋतु में होता था और करीब एक वर्ष इसके प्रारंभिक अनुष्ठानों की पूर्णता में लग जाता था। चूंकि यह शक्ति प्रदर्शन व सीमा विस्तार का अनुष्ठान था। अत: बहुत कम राजा ही इसे कर पाते थे। यही का...

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